भारत में उर्वरक खपत की क्षेत्रीय विषमताओं पर चर्चा अक्सर इस प्रश्न से शुरू होती है कि कौन-सा क्षेत्र अधिक उर्वरक इस्तेमाल करता है और कौन-सा कम। लेकिन उपलब्ध सामग्री की जाँच बताती है कि इस प्रश्न का उत्तर देने योग्य भारतीय क्षेत्रीय उर्वरक आँकड़े यहाँ मौजूद नहीं हैं। दिए गए आँकड़े जापान में किसान परिवारों द्वारा चावल की खपत से संबंधित हैं। इसलिए इनसे भारतीय कृषि का क्षेत्रीय मानचित्र बनाना, क्षेत्रों की तुलना करना या उर्वरक उपयोग के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
यह कमी केवल एक बाधा नहीं, बल्कि आँकड़ों को पढ़ने का महत्त्वपूर्ण सबक है। किसी राष्ट्रीय औसत, परिवार-आधारित खपत या खाद्य उपभोग के आँकड़े को कृषि-इनपुट की क्षेत्रीय तीव्रता का संकेतक मान लेने से ऐसी विषमता दिखाई दे सकती है जो मूल आँकड़ों में मापी ही नहीं गई थी।
उपलब्ध सामग्री वास्तव में क्या बताती है
प्रस्तुत सर्वेक्षण में किसान परिवार के स्तर पर चावल की खपत दर्ज की गई है। इसमें सामान्य चावल और चिपचिपे चावल को सम्मिलित करने वाली श्रेणी तथा चिपचिपे चावल की अलग श्रेणी उपलब्ध है।
| सूचक | दर्ज मात्रा | आँकड़ों की अवधि |
| सामान्य और चिपचिपे चावल की प्रति किसान परिवार कुल खपत | 329 किलोग्राम, वित्त वर्ष 2016 | अप्रैल 2017 से मार्च 2018 |
| सामान्य और चिपचिपे चावल की प्रति किसान परिवार भोजन के लिए खपत | 288 किलोग्राम, वित्त वर्ष 2016 | अप्रैल 2017 से मार्च 2018 |
| चिपचिपे चावल की प्रति किसान परिवार कुल खपत | 14 किलोग्राम, वित्त वर्ष 2016 | अप्रैल 2017 से मार्च 2018 |
| चिपचिपे चावल की प्रति किसान परिवार भोजन के लिए खपत | 12 किलोग्राम, वित्त वर्ष 2016 | अप्रैल 2017 से मार्च 2018 |
ये संख्याएँ चावल के घरेलू या पारिवारिक उपयोग को समझने में सहायक हैं। वे यह नहीं बतातीं कि खेत में कितना उर्वरक डाला गया, किस क्षेत्र में उसका उपयोग अधिक था, या अलग-अलग कृषि क्षेत्रों के बीच अंतर कितना था। चावल की खपत और उर्वरक खपत दो अलग सांख्यिकीय विषय हैं।
क्षेत्रीय विषमता के लिए केवल “खपत” शब्द पर्याप्त नहीं
उर्वरक खपत की तुलना तभी अर्थपूर्ण होती है जब “खपत” की परिभाषा सभी क्षेत्रों में समान हो। इसका आशय बाजार में बिक्री, किसानों तक वितरण, खेत पर वास्तविक उपयोग या किसी दूसरी प्रशासनिक गणना से हो सकता है। इन अवधारणाओं को मिलाने पर तुलना का आधार बदल जाता है।
इसी प्रकार कुल मात्रा अपने आप में क्षेत्रीय कृषि की तीव्रता नहीं बताती। बड़े कृषि क्षेत्र में कुल उपयोग अधिक हो सकता है, जबकि खेती की इकाई के सापेक्ष उपयोग कम हो। छोटे क्षेत्र में कुल उपयोग कम दिखाई दे सकता है, लेकिन कृषि भूमि या उत्पादन के सापेक्ष उसका स्तर अलग हो सकता है। अतः क्षेत्रीय विषमता का अर्थ केवल कुल मात्रा का अंतर नहीं, बल्कि समान मापदंड पर दिखाई देने वाला अंतर होना चाहिए।
उपलब्ध सामग्री में भारतीय क्षेत्रों के लिए न तो उर्वरक की कुल मात्रा दी गई है, न खेती की किसी साझा इकाई के अनुपात में उसका उपयोग, और न ही क्षेत्रवार तुलनीय समय-श्रृंखला। इसलिए “अधिक उपयोग करने वाला क्षेत्र” या “कम उपयोग करने वाला क्षेत्र” जैसी श्रेणियाँ बनाना प्रमाण से आगे निकल जाना होगा।
समय और भौगोलिक दायरे का मेल क्यों जरूरी है
प्रस्तुत चावल आँकड़े अप्रैल 2017 से मार्च 2018 के सर्वेक्षण में वित्त वर्ष 2016 की खपत बताते हैं। उनका भौगोलिक संदर्भ जापान है, जबकि लेख का प्रश्न भारतीय कृषि से संबंधित है। केवल समय करीब होने या दोनों विषयों का कृषि से संबंध होने के कारण ये आँकड़े परस्पर तुलनीय नहीं हो जाते।
किसी सार्थक क्षेत्रीय अध्ययन में सभी क्षेत्रों के आँकड़ों की अवधि, मापन-पद्धति, फसल-दायरा और इकाई एक जैसी होनी चाहिए। यदि किसी क्षेत्र के लिए बिक्री और दूसरे के लिए वास्तविक खेत-उपयोग लिया जाए, तो दिखाई देने वाला अंतर कृषि व्यवहार के बजाय लेखांकन-पद्धति का अंतर हो सकता है।
भारतीय पाठक के लिए अभी सुरक्षित निष्कर्ष क्या है
उपलब्ध सामग्री के आधार पर भारतीय कृषि में उर्वरक खपत की क्षेत्रीय विषमता की दिशा या परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता। इससे किसी क्षेत्र की कृषि-दक्षता, उत्पादकता, संसाधन-स्थिति या किसानों के व्यवहार पर निर्णय भी नहीं दिया जा सकता।
फिर भी सामग्री एक उपयोगी पद्धतिगत संकेत देती है: क्षेत्रीय तुलना से पहले यह देखना आवश्यक है कि आँकड़ा किस वस्तु को माप रहा है, उसकी इकाई क्या है, वह किस भौगोलिक स्तर का है और किस अवधि से संबंधित है। किसान परिवार की चावल खपत को उर्वरक उपयोग का अप्रत्यक्ष प्रमाण मानना इन सभी कसौटियों पर असंगत होगा।
आगे की तुलना के लिए आवश्यक आँकड़े
भारतीय कृषि की क्षेत्रीय विषमता पर प्रमाण-आधारित लेख तैयार करने के लिए समान अवधि के क्षेत्रवार उर्वरक-उपयोग आँकड़े चाहिए। उनके साथ माप की समान परिभाषा, कृषि क्षेत्र के आकार से तुलना करने योग्य आधार और यह स्पष्टता भी आवश्यक है कि आँकड़े बिक्री दिखाते हैं या खेत पर वास्तविक उपयोग।
फसल-संरचना, सिंचाई की उपलब्धता और भूमि की परिस्थितियाँ जैसे संदर्भ अलग हो सकते हैं, लेकिन उपलब्ध सामग्री इनमें से किसी का क्षेत्रवार विवरण नहीं देती। इसलिए इन कारणों को वर्तमान आँकड़ों से जोड़ना भी उचित नहीं होगा। पहले तुलनीय उर्वरक आँकड़े स्थापित किए जाने चाहिए; उसके बाद ही संभावित कारणों की अलग जाँच की जा सकती है।
इस विषय पर सबसे ईमानदार निष्कर्ष यही है कि क्षेत्रीय विषमता का दावा करने से पहले क्षेत्रीय प्रमाण होना चाहिए। उपलब्ध संख्याएँ विश्वसनीय हो सकती हैं, पर वे जिस प्रश्न का उत्तर देती हैं, वह किसान परिवारों की चावल खपत है—भारतीय कृषि में उर्वरक खपत का क्षेत्रीय वितरण नहीं।
出典
- 農林水産省「生産者の米穀在庫等調査」販売農家1戸当たりの水稲うるち米・もち米の消費量等(2017年4月~2018年3月調査): https://www.e-stat.go.jp/dbview?sid=0003348552
- 農林水産省「生産者の米穀在庫等調査」販売農家1戸当たりの水稲もち米の消費量等(2017年4月~2018年3月調査): https://www.e-stat.go.jp/dbview?sid=0003348554